जो देखा उसे गजलों में पिरोया


ख्वाहिशों से इतर हकीकत
 बदले जमाने की गजलों में अब ज्यादा दिखाई दे रही है। पत्रकार संदीप पाण्डेय ने जिंदगी में जो आसपास दिखा उसे गजलों में पिरोने की कोशिश की। उसमें वे काफी हद तक कामयाब रहे। उनका गजल संग्रह 'झूठ से अलग' हाल ही प्रकाशित हुआ है। संवेदना से खास रिश्ता रखने वाली गजलें सियासत के बदशक्ल 'चेहरे' के साथ आम आदमी की मासूमियत का इजहार करती हैं। शेरों की सूरत में उन्होंने यह भी बतलाने की कोशिश की है कि तमाम मुश्किलों के बीच मिलने वाली खुशी अनमोल होती है तो गुरूर अब इंसान की जरूरत में शामिल हो गया है। 

बदलते रिश्तों के बीच दिल की टूटन बयां की तो 'अश्क का इश्क' से नाता भी समझाया। परिंदों की 'बगावत' और दरिंदों की शराफत के साथ जिंदगी और मौत के बीच सुकून के पल ढूंढने की जद्दोजहद को भी अपनी लेखनी से उतारा। सरकारी बेशर्मी के बीच रसूखदार/ओहदेदारों का अचारण, सत्ता का लालचीपन, बढ़ते भ्रष्टाचार, चापलूसी, हक की मारामारी समेत कई जीवंत उलझनों पर बेबाकी से गजलों की शक्ल में राय रखी है। 'गरीबी से बिखर गया कोई, भूख की मौत मर गया कोई', आदमी छोटा हूं औकात बड़ी रखता हूं, दुश्मनों के लिए सौगात बड़ी रखता हूं, समेत 96 गजलों का गुलदस्ता है यह संग्रह। गजल के मापदंडों पर इन्हें जांचने वाले, अपनी राय देंगे पर इरादे के लिहाज से लेखक ने निर्मल होकर यह राय चुनी है। इस चुनाव के लिए उन्हें पढ़ा जाना चाहिए।

- प्रवीण जाखड़

राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित समीक्षा

गजल संग्रह मंगवाने के लिए लेखक संदीप पाण्डेय से संपर्क कर सकते हैं - 9829255841

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